एक योद्धा जिसने जम्मू के रेलवे स्टेशन को बचाने के लिए अपनी आख़िरी सांस तक आतंकवादियों से लड़ाई की – जानिए त्रिवेणी सिंह की कहानी!

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शहीद कभी मरते नहीं वे अमर रहते है। इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अपना नाम सुरक्षित कर लिया है – त्रिवेणी सिंह अशोक चक्र नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया गया है। त्रिवेणी सिंह भारतीय सेना के एक अफसर थे जिनको जम्मू रेलवे स्टेशन पर आतंकवादी हमले में उनके जंग के लिए अशोक चक्र का पुरस्कार से सम्मानित किया गया जो भारत का उच्च मयूर पुरस्कार है। 2 जनुअरी 2004 की शाम को त्रिवेणी सिंह को जम्मू के रेलवे स्टेशन पर आतंकवादी हमले की जानकारी मिली थी। 

एक कमांडिंग अफसर ने त्रिवेणी सिंह को कहा कि वे सारे अफसरों को जम्मू रेलवे स्टेशन पर आतंकवादी हमले की जानकारी दे और तैयार होने को कह दे। परिस्थिति के गहराई को जानते हुए त्रिवेणी सिंह ने अनुमति मांगी लीडर के रूप में जम्मू रेलवे स्टेशन पर जाने की उनके Commandos की टीम के साथ। 

त्रिवेणी सिंह पठानकोट पंजाब से थे जिनका जन्म 1 फेब्रुअरी 1978 नामकुम में हुआ था। उनके माता पिता का कहना है कि त्रिवेणी उनका एक लौटा बेटा था जिनको उन्होंने मार्शल आर्ट्स, कराटे सिखाये जब वे 15 वर्ष के थे और उन्हें मार्शल आर्ट्स में गोल्ड मैडल भी मिला था।  इतना ही नहीं वे स्विमिंग और एथलेटिक्स में भी गोल्ड मैडल जीत चुके थे। त्रिवेणी भारतीय सेना में भर्ती होना चाहते थे – उन्होंने अपना सपना पूरा किया और अपनी ज़िंदगी देश के नाम कर दी – ऐसे बहादुर सैनिक हमारे देश को मिलना एक गर्व कि बात है।

उन्होंने अकेले 300 यात्रियों की जान बचाई। 

जम्मू रेलवे स्टेशन पहुंचने पर उन्होंने देखा कि आतंकवादियों ने पहले ही 7 लोगो को मर डाला है – त्रिवेणी सिंह तुरंत लोगो कि जान बचने में लग गए और अपनी सेना को स्टेशन को घेर लेने का आदेश दे दिया। पहले उन्होंने एक आतंकवादी को मारा जो ओवर हेड रेल पूल से गोली चला रहा था। Lt त्रिवेणी सिंह जानते थे कि आतंकवादियों के पास जानलेवा हथियार थे और वे 300 यात्रिओ को मार देते जो पार्सल कक्ष में थे। 

त्रिवेणी सिंह ने साहस के साथ दूसरे आतंकवादी को भी मार डाला – सभी लोगो कि जान को खतरे से बहार निकाल लिया। गोलियों के एक दूसरे पर हमले करते वक़्त त्रिवेणी सिंह बहुत बुरी तरह से घायल हो चुके थे किन्तु जम्मू स्टेशन को आतंकवादियों से छुटकारा दिलाने तक उन्होंने हार नहीं मानी – लोगो की जान बचाने के बाद वे शहीद हो गए। उनकी वीरता, योद्धा शक्ति, और बलिदान पर त्रिवेणी सिंह को देश का उच्च मयूर पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी आख़िरी सांस तक आतंकवादियों से लड़ाई की थी। इन्होने घायल होने से पहले दो भारी हथियारों वाले आतंकवादियों को मार डाला जम्मू रेलवे स्टेशन पर और 300 असहाय यात्रियों की जान बचाई। 

Lt त्रिवेणी सिंह अब हम सबके लिए एक प्रेरणा है जिन्होंने अपना सबकुछ देश के नाम कर दिया – सबसे कीमती चीज़ भी – अपनी ज़िन्दगी। हमारा देश इनके बलिदान को कभी नहीं भूलेगा। त्रिवेणी सिंह हम सबके दिल में हमेशा ज़िंदा रहेंगे। 

त्रिवेणी शहीद होने वाले है – शायद वे पहले से जानते थे। 

31 दिसंबर 2003 की रोज – वे सेना क्लब में परिवार और दोस्तों के साथ पार्टी में मस्ती कर रहे थे – नाच भी रहे थे। जब पार्टी खत्म हुई तो वे क्लब को छोड़ने से पहले सभी को यह बोल के निकले कि शायद अब आप लोग हमे कभी ना देख पाओ। वे घर पर कॉफ़ी पि कर अपने यूनिट के लिए निकले और हथियारों कि जांच करने में खुद को व्यस्त कर लिया। और तब वे अपने युद्ध वर्दी में थे जैसे कोई मिशन के लिए तैयार हो। 

और 2 जनुअरी 2004 कि शाम को त्रिवेणी सिंह ने टीवी में जम्मू रेलवे स्टेशन के आतंकवादी हमले की खबर सुनी और अपने पांच commandos सहित रेलवे स्टेशन जम्मू पहुंच गए। जहा उन्होंने अपनी आख़िरी साँस ली। ऐसे बढ़े योद्धा को भारत कैसे भूल सकता है। 

 

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